Saturday, December 25, 2010

हम ना आएब :- भगवान के कथन


हम ना आएब ,
आखिर काहें आएब हम ,
केकरा-केकरा के समझायेब हम,
केकरा के न्याय के बात बताएब हम,
केकरा के शांति के पाठ पढायेब हम,

दू भाई के तांडव नृत्य
देखत रही जाएब हम ,
का एही खातिर आएब हम ,
केकर शांति दूत बन के जाएब
का भगवान वाला आपन छवि
खुद बचा पाएब हम ???

हम कौना-कौना रावण के मार गिरायेब
कौना- कौना कंस के मौत के नींद सुलायेब ?
अब शांति संदेस कहाँ सुनायेब ?
कौना कौना दुर्योधन के पास जाएब ?
का खुद बिना स्वार्थ के रह पाएब ????

जब चारू ओर हो रहल होखे चीर हरन ,
पुकारत होखसन द्रौपदी सब ,
हम कौना-कौना कौरव दरबार में जाएब ,
केकर केकर लाज बचायेब हम ,
जब चारो ओर मचल बा चीख पुकार,
का कौनो द्रौपदी के पुकार सुन पाएब हम ,

आखिर इतना वस्त्र -वसन कहा से लायेब हम ,
बहिर- गूंगा दर्शक बन के देखत रही जाएब हम ,
एहिसे सोचतानी नाही आएब हम ,
काहे से कि लूटत-बिलखत ऐ मानवता के ,
बचा ना पाएब हम , हाँ बचा ना पाएब हम ..


राजीव कुमार पाण्डेय
गोपालगंज , बिहार




Thursday, December 23, 2010

दहेज़ के खातिर

दहेज़ के खातिर

एक दिन सोचनी दुनिया के चिंता से दूर होकर के सोये के ,
बैठल रहनी एक दिन त एगो आवाज आइल रोये के ....
रउओ सुनी लोगिन ई रोये के आवाज कहा से आवता ,
जरुर कौनो बाप के ओकरा बेटी के चिंता सतावता ,
बेच दिहल जे अपना तन के
रेहन रखले बा अपना मन के
सिर्फ एगो वचन के बदला में
लेले बाड़े कुछ सिक्का कर्ज पर उ अपना कफ़न के बदला में

देख के बाबूजी के ई दसा
बेटी के मन में एगो बात आइल
का खाली एही खातिर जुटा के रखले बाडन बाबुजी जिन्दगी भर पाई पाई ??
का नारी बनल बाड़ी सिर्फ सेज और दहेज़ के खातिर ??
आखिर काहें ????
आखिर काहें गिरवी राखेलें
सब बाप अपना तन-मन के सिर्फ कुर्सी- मेज के खातिर ?

बेटी के मन में समाज के खातिर नफरत भर आइल
ओकरा बस सूली-फांसी ही नजर आइल
अउर फिर हो गइल एगो नारी कुर्बान दहेज़ के खातिर
चन्द कागज के टुकड़ा अउर कुर्सी मेज के खातिर ......

के रहे भिखारी ????


हम देखनी
के उ कुछ मांगत रहे
शायद उ कूछ मागते रहे
मईल , पुरान, फाटल कपड़ा के टुकड़ा में लिपटल
लाज से मारल सिकुडल तन रहे
आंसू से भरल नयन रहे ..

उ भूख के आग में जलत रहे
परकिरती के क्रूरता में पलत रहे
इन्सान के जानवर में बदलत रहे
इंसानियत के इहे बात खलत रहे ...

आपना मईल फाटल कपड़ा से अपना तन के ढंकत रहे उ
पेट क खातिर ही सही हाथ सब के आगे पटकत रहे उ ..

अदम्य क्रूरता के हद के परतीक रहे उ नारी
दुसहासी रहे या रहे भूख के मारी
लोग कहा रहे ओकरा के दूर हट रे भिखारी ...

दूसरा ओर हम जवन देखनी

समाज भी भूखाइल रहे
का पेट के ????
ना ना वासना के
उ मांगत रहे वासना के भीख

समाज के आँख में दया भी ना रहे
लोक- लाज और हया भी ना रहे
उ चलावत रहे फब्तीय्न के तीर
जवन बढावत रहे कलेजा के पीर

उ हंसत रहे दोसरा के बेबसी पर
दोसरा के तड़प पर
और शायद अपना असमर्थता और कायरता पर भी

आज हम सोच तानी
का बस एगो हम हीं रहनी ओकरा सहायता के अधिकारी ???
के रहे भिखारी ?
के रहे भिखारी ???????
उ समाज आ कि उ लाचार बेबस नारी ??????





सब केहू भूखल बा

सब केहू भूखल बा
केहू खिदमत केहू हिमायत
केहू इबादत के भूखल बा
जे बंदिश के दायरा में बा
उ इनायत के भूखल बा,

देखीं गौर से त ई सुनसान सहर बा
इन्शानियत के जनाजा पर बरसत कहर बा

ऐ कहर के लात से जेकर अरमान कुचल गइल बाटे
अपना अरमान के साथै उ भगवान से भी रूठल बा
काफिला से आज जेकर साथ छुटल बा
रोअत बिलखत याद से ओकर साथ जुटल बा

बचल बा जे ऐ शामत से उ खुदा के दुआ के भी भूखल बा
ओकरा खातिर त आज समन्दर भी सुखल बा
उ खिदमत , हिमायत और इबादत के भूखल बा,
उ त आज सब के नजर ऐ इनायत के भूखल बा ..............................



Wednesday, December 22, 2010

रऊआ काहे इतना गुरुर में रहीले

रऊआ काहे इतना गुरुर में रहीले
जब हम जागिले परेसान होके रऊआ चैन से सोइले
पर इ जान लीं , कि कुछ लोग बा जे हमके पावे खातिर आपन सारा नींद खोवेला
हमार एक झलक पावे खातिर उ दिन रात रोवेला
कही अईसन ना होके जे हम हमेसा खातिर अब चैन से सो जायीं
और रऊआ सारी उमर खातिर बेचैन से हो जायीं .........

बदल गइल बा आदमी

आज लागता कि बदल गइल बा आदमी ,
अपना लगावल आग में ही जल गइल बा आदमी,
कल जवन चीज के तरफ नजर भी नाही फेरत रहे,
आज वो ही खातिर काहे मचल गइल बा आदमी,
कल जे रहे पत्थर के जइसन अडिग ,
आज बर्फ के जइसन देख गल गइल बा आदमी,
कल तक जेकर सीमा ना रहे तय ,
आज त सांचा में ही ढल गइल बा आदमी,
डरत रहे जे कबो धोखा के बात करे से जे,
आज त विस्वास के ही देख बदल गइल बा आदमी,
कल डरत रहे जे आसमा के तरफ से देखे से,
आसमान के पैर के तले कुचल गइल बा आदमी,
कल तक खून के दबा से जे डर जात रहे ,
आज देख उ कर के कतल गइल बा आदमी,
बतावत रहे कल आदमी के पहचान जे,
आदमियत के मायने देख उहे बदल गइल बा आदमी,
आपन लगावल आग में ही आज जल गइल बा आदमी ,
आदमी के मायने बदल गइल बा आदमी.......

भोजपुरी वर्जन

हम तस्वीर जब भी बनाइले तोहार,
तो दिल में हमारा कई बात आ जाला ,
कभी तोहरा होंठ के लाली कभी गाल के तिल,
त कभी कमर के लचीलापन में कमी रह जाला ,
और जब भी बन जाला तस्वीर और हम देखी ले,
ता पता ना काहे उ तोहार ता बस एगो परछाई नजर आ जाला.,,,,,,,,,,,

कहा बाड़ भगवन तनी एक बार आव

ई एगो कविता बा जवान हम रौआ सभे के सामने रख तानी . आशा बा की अच्छा लागी .

कहा बाड़ भगवन तनी एक बार आव
आपन दरस तनी सबके देखाव

देख तोहरा दुनिया के का हो गली बा
जे रहे केतना सीधा उ टेढ़ा हो गइल बा

लागत्ता न सुधरी अब तोहर इ दुनिया
लजात अब नइखे काहें, देख ललमुनिया

ना माई के सुने ना बाप से डराए
और भाई के इज्जत के मिटटी में milaye,

कहे बाप से हम अब माडर्न हो गइल बानी
राउर वक़्त अब हो गइल बा एगो बितल कहानी ,

का इतना टाइम आगे हो गइल बा
की शर्म लाज , इज्जत अब सब खो गइल बा ?

अरे भगवन एक बार तनी तुन्हू आव
हे नादान के तुहूँ आके बताओ

की बहुत दिन ना रही इ नादान जवानी
इ उम्र के ना कही देख बन जाये कहानी

इ ता रहे देख भगवन उमर के नादानी
पर इ देख तू तनी एगो भौजी के कहानी,


माथा के आँचल भौजी अब सिर से गिरावेली
पति के अब देख उ डार्लिंग बुलावेली

सासु अम्मा देख अब आंटी हो गइल बाड़ी
पतोहिया के देख अब उ धोयेली साड़ी

बेटा ना सुने अब माँ के कौनो बात
बाप के भी दिखा देले कुछ ता उनकर औकात

का भगवन का बाकी बा अब देखे के तोहरा
कहे तू अब करतार ऐ पापन के पहरा,


अरे अपना दुनिया के कुछ ता सिखाव
ना ते ऐ दुनिया के मिटटी में मिला