Wednesday, December 22, 2010

बदल गइल बा आदमी

आज लागता कि बदल गइल बा आदमी ,
अपना लगावल आग में ही जल गइल बा आदमी,
कल जवन चीज के तरफ नजर भी नाही फेरत रहे,
आज वो ही खातिर काहे मचल गइल बा आदमी,
कल जे रहे पत्थर के जइसन अडिग ,
आज बर्फ के जइसन देख गल गइल बा आदमी,
कल तक जेकर सीमा ना रहे तय ,
आज त सांचा में ही ढल गइल बा आदमी,
डरत रहे जे कबो धोखा के बात करे से जे,
आज त विस्वास के ही देख बदल गइल बा आदमी,
कल डरत रहे जे आसमा के तरफ से देखे से,
आसमान के पैर के तले कुचल गइल बा आदमी,
कल तक खून के दबा से जे डर जात रहे ,
आज देख उ कर के कतल गइल बा आदमी,
बतावत रहे कल आदमी के पहचान जे,
आदमियत के मायने देख उहे बदल गइल बा आदमी,
आपन लगावल आग में ही आज जल गइल बा आदमी ,
आदमी के मायने बदल गइल बा आदमी.......

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